दांडी मार्च...
एक ऐसी यात्रा जिसने लिख दी बदलाव की गाथा
भारत के इतिहास में महात्मा गांधी की एक यात्रा ने बदलाव की ऐसी बयार चलाई की उसने पूरे भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध जन संघर्ष का व्यापक आंदोलन खड़ा कर दिया। उन्होंने इस यात्रा से बता दिया कि किस प्रकार किसी को झुकने या मजबूर करने के लिए जन आंदोलन खड़ा किया जा सकता है। यह वाकया भारत में अंग्रेजों के शासन के समय का है। 12 मार्च 1930 को गांधी जी ने नमक विरोधी कानून के विरोध में दांडी मार्च अर्थात् दांडी यात्रा निकाली थी। यह यात्रा अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से समुद्रतटीय गांव दांडी तक 78 व्यक्तियों के साथ पैदल निकाली गई।
दांडी तक की 386 km की दूरी तय करने में उन्हें 24 दिन लगे और इस यात्रा में पूरे रास्ते हजारों लोग जुड़ते चले गए। गांधी जी ने 6 अप्रैल, 1930 को भूमि में समुद्रतल से एक मुट्ठी नमक उठाया था।
इस मार्च में गांधी के साथ आने वालों में सभी वर्गों और जातियों के लोग शामिल थे। ब्राह्मण और हरिजनों ने एक साथ मार्च किया। गांधी को 5 मई को गिरफ्तार किया गया था लेकिन इससे पहले वे न केवल भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक लहर पैदा कर चुके थे। उस समय में टाइम पत्रिका ने अपने 31 मार्च के अंक पर गांधीजी की तस्वीर छापी थी। हालांकि इतिहास की अधिकांश किताबों में इस बड़ी घटना के बारे में बताया गया है और इतिहासकारों ने इसका बहुत विस्तार से अध्ययन किया है
गाँधी जी इच्छा
11 मार्च को गाँधी जी ने अपना वसीयतनामा कर अपनी इच्छा जताई कि आंदोलन लगातार चलता रहे,
इसके लिए सत्याग्ह की अखंड धारा बहती रहनी चाहिए,
क़ानून भले ही भंग हो, पर शांति रहे। लोग स्वयं ही नेता की जवाबदारी निभाएँ।
11 मार्च की शाम की प्रार्थना नदी किनारे रेत पर हुई, उस समय गाँधी जी के मुख से निम्न उद्गार निकले-
मेरा जन्म ब्रिटिश साम्राज्य का नाश करने के लिए ही हुआ है। मैं कौवे की मौत मरुँ या कुत्ते की मौत, पर स्वराज्य लिए बिना आश्रम में पैर नहीं रखूँगा।
गाँधीजी का कथन
गाँधी जी ने यात्रा के लिए और जेल जाने के लिए अलग-अलग दो थैले तैयार किए थे, जो उनकी यात्रा की तस्वीरों में देखे जा सकते हैं, क्योंकि समग्र यात्रा के दौरान कब जेल जाना पड़ जाए, यह तय नहीं था। 16 मार्च को गाँधी जी ने नवजीवन में लिखा था- "ब्रिटिश शासन ने सयानापन दिखाया, एक भी सिपाही मुझे देखने को नहीं मिला। जहाँ लोग उत्सव मनाने आए हों, वहाँ सिपाही का क्या काम? सिपाही क्या करे? पूर्ण स्वराज्य यदि हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है, तो हमें यह अधिकार प्राप्त करने में कितना समय लगना चाहिए? 30 कोटि मनुष्य जब स्वतंत्रता प्राप्ति का संकल्प करें, तो वह उसे मिलती ही है। 12 मार्च की सुबह का वह दृश्य उसी संकल्प का एक सुहाना रूप था।"








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